आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बहता पानी हूँ

                
                                                         
                            बहता पानी हूँ
                                                                 
                            

बहता पानी हूँ,
नहीं जानता मंज़िल का आख़िरी छोर,
मंज़िल अपनी चलता जाता हूँ,
चाहे जीवन का हो कोई भी दौर।

बहता पानी हूँ,
रुकना मेरा काम नहीं,
मुझसे कोई बैर भी रखे,
उससे मेरा कोई नुकसान नहीं।

बहता पानी हूँ,
चट्टानों से टकराकर भी मुस्काता हूँ,
हर ठोकर को राह बनाकर,
नई दिशा में बढ़ता जाता हूँ।

बहता पानी हूँ,
सूखी धरती की प्यास बुझाता हूँ,
बिना किसी अभिमान के हर पल,
जीवन का संदेश सुनाता हूँ।

बहता पानी हूँ,
न ऊँच-नीच का भेद कभी मानता हूँ,
हर खेत, हर वन, हर जन के लिए,
समान प्रेम की धारा बहाता हूँ।

बहता पानी हूँ,
कल-कल स्वर में गीत सुनाता हूँ,
रुकना नहीं, झुकना नहीं—
यही जीवन का सत्य सिखाता हूँ।
समय बदले, राह बदले, फिर भी
आगे ही आगे बढ़ता जाता हूँ।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर