रात को आंसुओं से सजाया
रात को आँसुओं से सजाया,
मानो अंधेरे का दर्पण
भीगते-भीगते चमक उठा हो।
तारे उतरे थे,
पर किसी ने छूने से पहले ही
नमी में घुलकर
ग़ायब हो गए।
तकिए के कोने
एक अघोषित कब्र बन गए,
जहाँ सपनों के शव
चुपचाप दफ़्न हैं।
सन्नाटा
इतना गाढ़ा था
कि आँसुओं की बूँदें
उसमें दरार डालती रहीं।
रात को आँसुओं से सजाना—
शायद यही कला है
जिसे कोई प्रदर्शनी नहीं मिलती,
पर हर दिल का अँधेरा कमरा
उसे याद रखता है।
-सुनील गुप्ता
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