पुस्तक अमृत जान ,करें जीवन आलोकित।
आधार संस्कृति ज्ञान, मनुज, मानवता के हित।
वाचन साधन, ध्यान, साधना की परिभाषा।
पाता है आकार, शब्दों में अभिलाषा।
श्री रामायण, वेद, महाभारत औ गीता।
प्रकट जहां श्रीकृष्ण, राम ,राधा- मां सीता।
मर्यादित व्यवहार, यहीं पर हमने सीखा।
कब बोलें मीठे बोल, कहां पर बोलें तीखा।
गांव नगर-चौपाल ,पुस्तकें थीं गुरुमाता।
सुंदर है -शिव- सत्य, प्रकाश यहीं से आता।
ऋषियों ने धर ध्यान, लिखा जब अनुभव सारा।
संस्कृति का विस्तार , मातृभूमि में वारा।
वाचन से समृद्ध, हुई जब दुनिया सारी।
माने गए अवतार, यहीं के नर औ’ नारी।
– सुनील गुप्ता
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