समय न तो दिखाई देता है,
न ही किसी अलमारी में रखकर
बचाया जा सकता है।
वह बहते पानी जैसा है
जिसे मुट्ठी में भरने की कोशिश
केवल हथेलियों को गीला करती है,
पानी को रोकती नहीं।
समय की आवाज़ नहीं होती,
लेकिन उसकी चुप्पी में
जीवन की सारी हलचलें दर्ज होती हैं।
यह चलते हुए
हमसे बहुत कुछ छीन लेता है,
और उतना ही कुछ देकर
हमें बदल भी देता है।
कोई उसे घड़ी की टिक-टिक में मापता है,
कोई सूरज-चाँद की गति से,
और कोई अपने सफ़ेद होते बालों से।
पर सच यह है
समय की पकड़ किसी के पास नहीं,
उसका स्पर्श ही हमारा जीवन है।
जो समय को पकड़ना चाहते हैं,
वे थककर पछताते हैं।
जो समय के साथ चलना सीख लेते हैं,
वे जीवन का असली स्वाद चखते हैं।
समय न कभी जल्दी करता है,
न देर।
वह बस आता है,
और बीत जाता है
बिना लौटे,
बिना माफी माँगे।
-सुनील गुप्ता
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