है नहीं कुछ ऐसा तुम बस मुझे ही दिखो
होता तो हर रोज वो चादर ओढ़ लेता
काश तू भी साथ होता इस ढलती शाम में
अच्छी सी खुद खुशी करके खुदा से नाता जोड़ लेता
तुम सुनोगे तो मैं कहीं से भी कहदूँ
समेटकर इस हवा को तुम्हारी और मोड देता
जरूरी है ये जाँ भी तुम्हें चाहने के लिए
रखा ही क्या है ये जहाँ कब का छोड़ देता
तुमपर तुम्हारे जुल्फ ही खूब लगते है वरना
ये आफताब क्या मैं सितारे भी तोड़ लेता
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