रात दिन ख्यालों में उसके
यह मन खोया सा रहता हैं
कभी नभ को देखता
चांद को निहारता
बादलों से बात करता
कहता उन से यह मन
उस सा चेहरा देखा नहीं क्या
या उसी बातें सुनी नहीं क्या
तब उत्तर भी मन देता
देखे कई हंसी चेहरे
कोई चांद सा चेहरा
कोई कमल सुनेहरा
मगर उसके सामने
क्या चांद क्या कमल
क्यों
चांदभी एक दागलेके आता है
कमल रात को मुरझा जाता है
क्या इन की उपमा दूं उसे
जो दीपशिखा सा
प्रकाश चारों फैलाता है
.....
तभी तो वह सबसे
मनोहर कहलाता
-सुमित जोशी
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