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सामने जब जबतुम दिखे

                
                                                         
                            सामने जब जबतुम दिखे
                                                                 
                            
एक एहसास अपना सा मिले
नयनों में आपकी हम को तो
एक राज छिपता सा है मिलें

गुज़रे हुए उस स्वप्न की
कहीं आप तो वोव्यथा नहीं
निसदिन निशा को काटती
कहीं आप तो वो कथा नहीं

कैसी है कोरी विडंबना
उस यक्ष से मिलती कहीं
उस को वियोग एक वर्ष था
मेरा वियोग पता नहीं

उस भूल का अब क्या करूं
जो देख तुम को हो चुकी
निस दिन तेरे ख्यालों में
यह जीन्दगी चलतें चलीं

तट में विपासा के कभी जो
कुछ समय को तुम दिखे यू
एक बात मन यूं चली
जो बात अब मिटती नहीं
-सुमित जोशी 
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2 महीने पहले

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