राह चाहे कठिन हो, डगर हो कठिन,
पाँव फिर भी बढ़ाना तो तय है प्रिये।
रात कितनी भी गहरी उतर आए यदि,
भोर बनकर सँवरना तो तय है प्रिये।
आँधियाँ लाख रोके सफ़र की दिशा,
हौसलों का ठहरना न तय है प्रिये।
हार पल दो पल की मेहमान भर,
जीत बनकर उभरना तो तय है प्रिये।
कर्म की राह जो छोड़ता ही नहीं,
उसका मंज़िल से मिलना तो तय है प्रिये।
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