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शिक्षा बढ़ी, जाति क्यों बढ़ी?

                
                                                         
                            किताबें बढ़ीं,
                                                                 
                            
डिग्रियाँ बढ़ीं,
ज्ञान का उजियारा बढ़ा—
फिर क्यों मन के अँधियारे में
जाति का पहरा खड़ा?

जो कल दबाया जाता था,
आज भी कहीं दबता है;
बस चेहरे बदले हैं,
दमन का ढंग नहीं बदलता है।

वह पढ़ता है—
तो योग्यता पर प्रश्न उठते हैं,
वह बढ़ता है—
तो पुराने सिंहासन हिलते हैं।

बराबरी की बात करो तो
कहते हैं— “अब भेद कहाँ?”
पर जाति पूछकर रिश्ते चुनते हैं,
फिर कहते हैं— “जाति है कहाँ?”

शिक्षा ने अक्षर तो सिखलाए,
पर मनुष्य पढ़ना बाकी है;
डिग्री हाथ में आ गई,
पर बराबरी की शिक्षा बाकी है।

जिस दिन जाति से पहले
इंसान दिखाई देगा—
उस दिन समझेंगे,
शिक्षा सचमुच समाज में आई है।
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2 महीने पहले

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