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"हुंकार: जागो हे पुरुषार्थी!"

                
                                                         
                            विपदाएं जब घेरें तुमको,
                                                                 
                            
तुम शूलों पर मुस्काया करो,
कायर रोते हैं कोनों में,
तुम सिंहनाद कर जाया करो।

यह धरा वीर की दासी है,
यह कायर को धिक्कार रही,
इतिहास गवाही देता है,
केवल पौरुष की जयकार रही!

चुप रहकर सहना अत्याचार,
यह तो केवल मृत देह का काम,
जो जीवित है वह लड़ेगा ही,
मत लो तुम कायरता का नाम।

अन्याय अगर सीमा लांघे,
तो गांडीव को उठाना सीखो,
जो न्याय की भाषा समझ न सके,
उसे शीश उड़ाना सीखो।

क्या बैठे हो तुम भाग्य भरोसे?
भाग्य तो हाथों की रेखा है,
इतिहास बदलने वालों ने,
कब भाग्य का पन्ना देखा है?

लौह शिराओं में रक्त नहीं,
अंगारों का तूफान भरो,
मृत्यु भी थर-थर कांप उठे,
कुछ ऐसा तुम प्रस्थान करो।

तोड़ो ये बेड़ियाँ मोह की,
तुम काल के चक्र को मोड़ो तो,
सूरज भी मद्धिम पड़ जाए,
तुम आँखें अपनी खोलो तो।

जब तक रग में हुंकार बची,
तब तक मत झुकना राहों में,
ब्रह्मांड भी आकर सिमटेगा,
एक दिन तुम्हारी बाहों में!
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3 महीने पहले

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