झरना कहता आगे बढ़ना,
राहों के अवरोध हटाओ,
सूरज कहता तमस चीरकर,
जग में नया सवेरा लाओ।
समझ रही हो क्या कहती है,
पवित्र पावन अग्नि-शिखा?
जलकर भी तुम जीवन पथ पर,
सबको सच्चा मार्ग दिखा।
तरुवर कहता झुकना सीखो,
जब भी आए फल का भार,
वायु कहती बहती जाओ,
बाँट रही जो सुख औ' प्यार।
दीपक कहता घोर तिमिर में,
तुम एक छोटी आस बनो,
चट्टानें कहतीं संकट में,
धैर्यवान और ख़ास बनो।
ऋतुएँ कहतीं धीरज रखना,
सुख-दुख तो आते-जाते हैं,
पतझड़ के ही साए अक्सर,
मधुमास नए ले आते हैं।
नदियाँ कहतीं सागर पाना,
तो राहें खुद ही बनाओ,
दुनिया की परवाह किए बिन,
कल-कल करती बढ़ती जाओ।
माटी कहती सहना सीखो,
तभी तो सृजन महकता है,
हौसले बुलंद हों जिसके,
वो अम्बर पर चमकता है!
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