मेरी कलम की नोक पर आज फिर एक सवाल ज़िंदा है,
कि इस चमकते दौर में इंसानियत क्यों शर्मिंदा है?
मैं चंद अल्फ़ाज़ नहीं,
सदियों का ठहरा हुआ दर्द लिखती हूँ,
दफ़्तरों की फाइलों में घुटता,
एक आम इंसान का अक्स लिखती हूँ।
"जब मेज़ के नीचे से गुज़रती है वो ज़हरीली मुस्कान,
तब सिर्फ़ कानून नहीं मरता,
मर जाता है एक पूरा इंसान।"
धुरंधर बनकर जो बैठे हैं यहाँ सिर्फ़ कुर्सियाँ संभलने को,
उन्हें फ़ुर्सत कहाँ है इस ढहती हुई दीवार को बचाने को?
वो कागज़ के पन्नों पर तरक्की का एक झूठा जहान बुनते हैं,
और हम हर रोज़ धूप में डिग्रियों को राख होते देखते हैं।
यह भ्रष्टाचार महज़ नोटों की हेरा-फेरी नहीं है,
यह एक माँ के चूल्हे की भूख है,
जो अब तक बुझी नहीं है।
यह उस युवा का आत्मसम्मान है
जिसे हर मोड़ पर कुचला गया,
यह उस ईमानदारी का कत्ल है
जिसे कमज़ोरी का नाम दिया गया।
पर मेरी स्याही गवाह है,
यह ख़ामोशी हमेशा नहीं रहेगी,
जब एक लेखिका की कलम इस तंत्र की कड़वी हकीकत कहेगी।
सिंहासन पर बैठे दीमकों को
अब यह समझना ही होगा,
जब जनता का सब्र टूटेगा,
तो इस ज़ुल्म का सूरज डूबेगा।
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