सृष्टि के उस पहले पल से,
मैं ही तो बहता आया हूँ,
जब कुछ भी नहीं था इस जग में,
मैं तब भी फैला पाया हूँ।
मेरा कोई अपना रूप नहीं,
पर हर रूप में मैं ही ढलता हूँ,
कहीं सदियों की जमी बर्फ़ हूँ मैं,
कहीं खौल के लावा चलता हूँ।
लोग कहते हैं मैं केवल बुझाता हूँ ,
तपती हुई प्यास को,
पर कोई पढ़ नहीं पाता,
मेरी आँखों में छिपे इतिहास को।
जब कोई थककर हार जाता है ,
इस मतलबी दुनिया की धूप में,
मैं चुपके से उसकी आँखों से बह जाता हूँ,
अश्क के रूप में।
हाँ,
मैं ही गंगा की लहरों में बहकर
पुरखों का तर्पण बनता हूँ,
और मैं ही किसी तन्हा आशिक की आँखों का सूनापन बनता हूँ।
मुझमें न कोई रंग है मेरा,
न कोई ज़ात या मज़हब का पहरा है,
मैं अमीर के महलों में भी हूँ,
और गरीब की झोपड़ी में भी उतना ही गहरा हूं।
चट्टानें लाख रोकें रास्ता मेरा,
मैं उनसे कभी लड़ता नहीं,
मैं बस चुपचाप राह बदल लेता हूँ,
पर कदम कभी रुकता नहीं।
लहरों का शोर तो बस
दुनिया को दिखाने का एक ज़रिया है,
मेरी असली ताकत तो वो खामोशी है,
जो छुपाए बैठा समंदर का दरिया है।
धूप की आँच जब सह नहीं पाता,
तो मैं खुद को मिटा देता हूँ,
भाप बनकर आसमान की गोद में,
एक नया घर बसा लेता हूँ।
और फिर जब धरती तपने लगती है,
अपनों के वियोग में,
मैं अमृत की बूंदें बनकर बरस जाता हूं ,
इस सृष्टि के योग में।
मुझे बांधने की कोशिश मत करो ,
इन इंसानी सरहदों के जालों में,
मैं तो वो अहसास हूँ जो बहता है ,
कवियों के इन खयालों में।
मैं पानी हूँ साहब,
मेरा कोई अंत या किनारा नहीं होता,
मैं अगर रूठ जाऊँ इस दुनिया से,
तो फिर कोई सवेरा दोबारा नहीं होता!
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