वृक्ष ने कभी लताओं से प्रश्न नहीं किया,बस जड़ों पर विश्वास करता रहा।
एक दिन धूप वैसी ही थी,हवा भी वही थी,पर आँगन मेंएक तीसरी छाया उग आई।
दीपक बुझा नहीं था,किन्तु उसकी लौकिसी अनदेखी खिड़की की ओर झुकने लगी।
चिड़िया घोंसला छोड़कर नहीं गई,बस तिनकेकिसी और डाल पर सजाने लगी।
समुद्र ने लहरों को नहीं रोका,पर ज्वार नेकिनारों का धर्म बदल दिया।
किसी ने कुछ कहा नहीं,फिर भी मौन के भीतरहज़ारों स्वीकारोक्तियाँ जन्म लेती रहीं।
सब कुछ यथावत था—मंगलसूत्र, चौखट, तुलसी, दीप, आँगन...बस आत्मा के मंदिर मेंएक अदृश्य दरार पड़ चुकी थी।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X