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टूटते ख़्वाब

                
                                                         
                            टूटते ख्वाब
                                                                 
                            
चुनना होगा, फिर बुनना होगा
नित-प्रतिदिन जलना होगा,
फिर भी तुमको चलना होगा |
ज़ख़्मों से चाहें,रीसें खून तुम्हारे,
फिर भी धीरज धरना होगा |
सुख का सूरज जब तक न देखो।
टूटे ख्वाबों में पलना होगा।
हाँ, ख्वाब वही जो सोने न दें।
लगन तुम्हारी, तुम्हें रोने न दें,
उठ, भर हुंकार की सारा जग काँप उठे|
बन कर्मठ की तू तेरा सब संताप हरे,
दुख के सूरज को ढलना होगा।
तब-तक टूटे ख्वाबों में पलना होगा।
तन्द्रालस को त्यागना होगा,
किस्मत से धींगा-मुश्ती करना होगा,
तब नग को धारण कर पाओगे,
फिर स्वच्छंद सौरव-सा बह पाओगे,
इतना कर्म जब कर जाओगे,
निश्चय सामर्थ्य-शिखर पर चढ़ जाओगे।
-सुधीर
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एक घंटा पहले

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