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हंडिया, दारू ने उजाड़ दी थी सारी गृहस्थी |

                
                                                         
                            सुगना
                                                                 
                            

देखा,आज फिर आम के पेड़ों के नीचे
पेट- पीठ एक हुए जा रहे,
कुरमुट लगा बैठी सुगना को
जेठ की दुपहरिया में
मासूम , गुमसुम सुगना
अनायास पूछ बैठा ‘ बेटा ’
आँखों के नीचे ये चोट कैसा?
तुतला कर बोली- बाबा ने माला (मारा) |
छः बरस की बच्ची,
शायद बहुत कुछ समझती |
अंगारें बरस पड़े हृदय में सुनकर,
बाप आया था आज फिर पी कर |
पोंछ लुढ़क आया आँसू गालों पर,
दौड़ी धम्म से गिरे आमों पर |
भूख से सूख चुकी सुगना….
ओह! हाय रे! बिन माँ की बच्ची,
तीन माह पहले गुज़र गई माँ उसकी |
हंडिया, दारू ने उजाड़ दी थी सारी गृहस्थी |
छोटी- सी बच्ची, सुगना
बोली थी- ‘भूख लगी है बाबा
अब रहा नहीं जाता ’ ,
बस इतनी ही बात ,
चला दिया था हाथ |
अभी खा आमों को, भूख मिटा रही है,
प्रकृति ने रचा खेल ,अब वही दया दिखा रही है|
-सुधीर….
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एक घंटा पहले

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