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मैं कौन हूं?

                
                                                         
                            बचपन से मैंने बस उतार-चढ़ाव देखे हैं,
                                                                 
                            
अपनों के दिए कई गहरे घाव देखे हैं।
पराये को छोड़ो कोई अपना खुश नहीं मुझसे है,
फिर भी मैंने हर रिश्ता हमेशा निभाया दिल से है।

मैं एक पल में सबके दुखड़े को हर लेती थी,
दुख दूर करके सबके मैं खुशियों से भर देती थी।
आज वही दुख लौट करके वार करते हैं,
क्या मिला सबको हंसाकर मुझसे सवाल करते हैं।
पूछते हैं — सबको बचाया, खुद से कैसे उबरोगी?
इस भँवर से अकेले कैसे पार उतरोगी?

नहीं किसी लायक फिर भी माँ-बाप का मान करती हूं,
उनके चरणों में प्रतिपल करोड़ों प्रणाम करती हूं।
नहीं कोई ऊंचा पद न कोई अधिकारी हूँ,
पर खुश हूं, इंसान बनकर न किसी की शिकारी हूं।

जीवन के थपेड़े मैंने भी बहुत झेले हैं,
जीवन सरल नहीं यहां रंजो गम के मेले है।
मैं क्रूर नहीं, पर झूठी नरमी नहीं आती है,
मेरी डाँट में मेरी ममता बिखर जाती है।

पति ही मेरा अब आखिरी मुकाम है,
उन्हीं में ढूंढना अपना बाकी जहान है।
औरों सी मीठी बातें मैं कर नहीं पाती,
झूठे दिखावे से रिश्तों में मैल भर नहीं पाती।

पर सच तो ये है — सबको अपने दिल में जीती हूँ,
दर्द किसी को हो तो पहले मैं ही सीती हूँ।
कोई दूर जाए तो दिल घबराता है,
खोने के ख्याल से ही मन सिहर जाता है।

अब बस एक ही अरमान बचा है मन में,
कोई तो समझे मोल मेरा भी इस जीवन में।
मैं भी तो चाहूँ — कोई मुझे भी समझाए,
मेरी अहमियत क्या है, कोई मुझे भी बताए।

लोगों की चुप्पी देखकर मैं भी मौन हूँ,
क्या अहमियत है मेरी, मैं कौन हूँ?
- सुधा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

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