कुछ बोलूँ या कुछ गुनगुनाऊँ, या भाग्य पे अपने इतराऊँ,
सौभाग्य मिला कुछ कहने का, पर वीरों की गाथा के योग्य शब्द कहाँ से लाऊँ।
क्या व्यक्त करूँ मैं शब्दों में, आजादी के बलिदानों को,
वो शब्द सुमन कहाँ से लाऊँ, कि नमन करूँ वीर जवानों को।
कैसे व्यक्त करूँ शब्दों में, माँ की आँख के आँसू को,
जब छोड़ गया एक मात्र सहारा, बेबस बूढ़े बापू को।
सजल नयनों से बाट जोहती, बहना भाई के आवन की,
कैसे धागे बिखरे थे, टूटी थी राखी सावन की।
न रंग मेहंदी के छूटे थे, न उतरी शादी की चूड़ियाँ थीं,
मुख भी न उसने देखा था, जिसके घर जनमी गुड़िया थी।
मेरा रंग दे बसंती चोला, ये बोल वो वीर बोले थे,
चूम मौत के फंदे को, जय हिंद कह वे झूले थे।
हम में ही आजाद, भगत, मंगल और झाँसी की रानी है,
जागो फिर से एक बनो, बस बात यही समझानी है।
हो सुरक्षित भविष्य देश का, तन मन से सब एक बनो,
सबके अंतर्मन में पुण्य बसे, सब कर्म से अपने नेक बनो।
-सुधा पाण्डेय
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