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दुनिया का दर्द - प्रदूषण

                
                                                         
                            नहीं कहानी किसी एक की, दुनिया का दर्द मैं लिखती हूँ,
                                                                 
                            
साँस-साँस में घुला प्रदूषण है, यही व्यक्त मैं करती हूँ।

कभी हिमालय श्वेत धवल था, अब राख लपेटे चोटी है,
गंगा-यमुना-ब्रह्मपुत्र, कचरे में डूबी रोती हैं।

दिल्ली की सुबह धुंध में खोई, मुंबई की हवा भी भारी है,
खेतों में कीटनाशक है और, गाँवों में लाचारी है।

उत्तर-दक्षिण, पूर्व पश्चिम, भारत की यही कहानी है,
कारखानों के धुएँ और पॉलिथीन ही अब निशानी है।

पीपल बरगद पूछ रहे हैं, कहाँ गया वो नीम का छाँव,
प्लास्टिक खाती गायें घुटती, सूख रहा है हर इक गाँव।

पर मैं भारत की बेटी हूँ, हार कभी नहीं मानूंगी,
हर आँगन में तुलसी हो, तो जीवन धन्य मैं मानूंगी।

नहीं महल, न दुर्ग चाहिए, निर्मल नभ ही काफी है,
एक-एक पौधा हम सब रोपे, वही भविष्य का साथी है।

मैं अम्बेडकर नगर की सुधा, पूरे भारत से ये कहती हूँ,
प्रदूषण मुक्त करो पृथ्वी को आह्वान सभी का करती हूं।

 
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47 मिनट पहले

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