दिया ईश्वर ने खुद से जो वही वरदान है पापा,
नहीं दूजा कोई इनसा मेरे भगवान है पापा।
बचाते बच्चों को अपने हमेशा दुख व पीड़ा से, हैं सुख की छांव करते जो वही आसमान हैं पापा।
रहे जब बात औलादों की तो हटते नहीं पीछे, समन्दर को सुखा दे जो वही तूफान हैं पापा।
सिखाते इस जमाने की कठिन बारीकियां उनको, जगाते उनके उर में नित नए अरमान हैं पापा।
सजा देता हैं ईश्वर भी नियम जो सृष्टि का जो तोड़े, दुखाये दिल भी उनका तो देते वरदान हैं पापा।
नहीं इंसान दुनियां में यहाँ निस्वार्थ है कोई, बिना शर्तों के चाहे जो वही इंसान हैं पापा।
नहीं फैले हमारे हाथ किसी भी गैर के आगे, इसीलिए थकते नहीं हरदम ही करते काम हैं पापा।
बनाते हमको इस काबिल खड़े हो अपने पैरों पर, काबिलियत देती हमको जो वही सम्मान है पापा।
नहीं उनको कभी रहता फर्क बेटी या बेटे में, मतलबी दुनिया की इस सोच से अंजान हैं पापा।
जता न पाते हैं हरदम ये अपनी मोह-ममता को, इसी संकोच से हरदम रहे बदनाम है पापा।
मुझे हर पग पे पड़ती है जरूरत आपकी पापा, स्वरचित सुधा का जीवन इसके बिन वीरान है पापा।
- सुधा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X