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मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूँ।

                
                                                         
                            नहीं कहानी और किसी की, अपना परिचय देती हूँ,
                                                                 
                            
मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूँ।

नहीं महल, न दुर्ग-अटारी, न रजवाड़े की शान हूँ मैं,
मध्यमवर्गीय द्विज कुल की कन्या, निज मात-पिता की जान हूँ मैं,
निज जननी की पावन कोख की मैं ही पहली खेती हूँ,
मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूँ।

मैं डरती नहीं अँधेरे से, माँ-बाप ने जलना सिखाया है,
सास-ससुर और पति ने भी हर पल मेरा हौसला बढ़ाया है,
इन सबके आशीष से ही मैं प्रेरणा लेती हूँ,
मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूँ।

गोविन्द साहब का पावन मेला पीहर की याद दिलाता है,
ससुराल से कुछ दूरी पर किछौछा का बाबा दरबार लगाता है,
*श्रवणक्षेत्र को शीश नवाकर सरयू जल से अर्घ्य मै देती हूँ, मैं अम्बेडकर नगर की बेटी हूं।

टांडा के टांट की तरह मजबूत मेरा हौसला है,
अकबरपुर की मिट्टी-सा पावन मेरा फैसला है,
निराशा की बंजर धरती में भी आशा के बीज मैं बोती हूँ,
मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूँ।

मिला नाम संविधान निर्माता का, मैं इसको शीश नवाती हूँ,
खेतों में बलखाती फसलों-सी लहराती हूँ,
जिले के नाम से अपनी कविता में शब्द पिरोती हूँ,
मैं अंबेडकर नगर की बेटी हूं।
 
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एक घंटा पहले

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