*हिंदी दिवस विशेष (2026)*
*कविता - _मैं हिंदी हूँ*_ अंग्रेजों की बंदी हूँ।
*स्वरचित: सुधा पांडेय, अंबेडकर नगर*
हां हां मैं हिंदी हूं, जी सबकी प्यारी हिंदी हूं,
हां हां मैं हिंदी हूं।
उत्तर से लेकर दक्षिण को जाती,
पूर्व की बातें पश्चिम पहुँचाती -2,
सबको बांधू एक ही डोर से न बांग्ला न सिंधी हूँ,
हाँ जी हां मैं हिंदी हूं।
भइया के हाथों में है जो बंधन,
बापू के माथे पे है जो चंदन -2,
करती मैं सबका अभिनंदन,
मां के माथे की बिंदी हूँ,
हां हां मैं हिंदी हूं जी सबकी प्यारी हिंदी हूं।
भाषा की अनुपम फुलवारी,
बचपन की प्यारी किलकारी -2,
संविधान की बगिया में सबसे रंग-बिरंगी हूं,
हां हां मैं हिंदी हूं।
अनपढ़ से मैं ज्ञानी बनाती,
स्वावलंबी स्वाभिमानी बनाती -2,
मैं नहीं करती वैर किसी से न किसी की प्रतिद्वंद्वी हूं,
हां हां मैं हिंदी हूं।
संस्कृत की बेटी कहलाती,
मीरा तुलसी के पद गाती -2,
रस छंदों के मिलन से मीठी बिल्कुल नहीं दरिंदी हूं,
हां हां मैं हिंदी हूं।
वैज्ञानिक मौलिकता वाली,
सार्थकता नैतिकता वाली -2,
नहीं है कोई दोष जी मुझमें न कलुषित न गंदी हूँ,
हां हां जी मैं हिंदी हूं।
भारत के अभिमान की भाषा,
लेकर अपने सम्मान की आशा -2,
इस आजाद वतन में अब भी अंग्रेजों की बंदी हूँ,
हां हां मैं हिंदी हूं।
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