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आत्म मंथन

                
                                                         
                            *आत्म मंथन*
                                                                 
                            
कभी आईने के सामने खड़ी होती हूँ,
तो पूछती हूँ खुद से,
कौन हूँ मैं?
सुधा दूबे — एक बहू, एक बेटी, एक माँ,
या वो लड़की जो कभी दिल खोल कर जीवन जिया करती थी?
कहीं गुमराह हो गई हूँ ग़मों के कारवां में,
अब उभर जाना चाहती हूं, फिर से मुस्कुराना चाहती हूं।
जीवन भागता रहा,
मैं निभाती रही,
सबके दुख अपने आँचल में समेटती रही,
पर अपना मन,
कहीं पीछे छूटता रहा।

आज जब एकांत में बैठती हूँ,
तो भीतर एक आवाज़ आती है,
धीरे से कहती है —
थक गई हो न?

हाँ, थकी हूँ,
पर टूटी नहीं हूँ,
क्योंकि मेरे शब्द अभी जीवित हैं,
मेरी कविताएँ अभी मेरी साँसों में हैं।

मैंने जाना,
खुद को खोकर किसी को पाया नहीं जाता,
पहले खुद को पाना पड़ता है,
तभी तो दूसरों को रोशनी दी जाती है।

ये आत्म मंथन ही तो है,
जो मुझे फिर से मुझसे मिलाता है।
-सुधा पाण्डेय
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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