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कंधा और आदमी

                
                                                         
                            मरते ही आदमी कितना
                                                                 
                            
प्रसिद्ध हो जाता है ।
कभी एक कंधा न था सिरहाने
आज कितने कंधे साथ हैं।
कभी अपने संबोधन से वंचित थे
आज राम नाम की गूँज साथ हैं ।
जाने कितने दिन -रात अकेले थे
पर दरवाजे के पार
आवाज़ें थी , हँसी थी,
बर्तन की खनक थी ।
उसकी खामोशी अकेली थी
कितना अजीब है यह संसार -
जब तक चेतना जागृत थी
एक कंधा मुश्किल था ।
लेकिन चेतना के शून्य होते ही
कितने कंधे साथ हैं ।
मृत्यु के लिए जरूरत है -
चार कंधों की ।
पर जीवन के लिए एक कंधा
ही काफी है ।
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3 घंटे पहले

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