संकरी -संकरी गलियां
न जाने ले जाती कहाँ ?
अनजान मन चलता जाता ,
मन ही मन डरता जाता
पूछने पर कोई भी कह देता ,
"चलते रहिये "
एक ही गली लम्बी पूँछ लिए
अचानक लाकर खड़ा कर देती वहां
बेबाक रह गया देखता
दृश्य सपाट भर नज़रो से,
दूर -दूर तक
स्पष्ट था गंगा का फैला आँचल
बनारस के घाट पर
सीढ़ियों पर ,
खूद को खड़ा पाकर
हां ! देखा ,
नन्ही -नन्ही दुकानों में
माथे तिलक लगायें
बेचते दुकानदार
अपने सामान को ,
पुचकारते आगे बढ़ जाने के लिए
गली से गुजरते
शांत स्वभाव लिए सांड़ को ,
जहाँ बयान करता है
चबूतरा
मायने नहीं रखता यह शहर
जाति -धर्म से बाधित
हिन्दू -मुसलमान को ,
यह तो जीवित है
स्वयं में अपने सम्मान को II
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