आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गलियां बनारस की ...

BANARAS KI GALIYA...
                
                                                         
                            संकरी -संकरी गलियां
                                                                 
                            
न जाने ले जाती कहाँ ?
अनजान मन चलता जाता ,
मन ही मन डरता जाता
पूछने पर कोई भी कह देता ,
"चलते रहिये "
एक ही गली लम्बी पूँछ लिए
अचानक लाकर खड़ा कर देती वहां
बेबाक रह गया देखता
दृश्य सपाट भर नज़रो से,
दूर -दूर तक
स्पष्ट था गंगा का फैला आँचल
बनारस के घाट पर
सीढ़ियों पर ,
खूद को खड़ा पाकर
हां ! देखा ,
नन्ही -नन्ही दुकानों में
माथे तिलक लगायें
बेचते दुकानदार
अपने सामान को ,
पुचकारते आगे बढ़ जाने के लिए
गली से गुजरते
शांत स्वभाव लिए सांड़ को ,
जहाँ बयान करता है
चबूतरा
मायने नहीं रखता यह शहर
जाति -धर्म से बाधित
हिन्दू -मुसलमान को ,
यह तो जीवित है
स्वयं में अपने सम्मान को II

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।


 
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर