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दुर्गा माँ की दिव्य अनुभूति

                
                                                         
                            काशफूल की खुशबू में माँ के आने का पैगाम है,
                                                                 
                            
ढाक की थाप और शंखध्वनि में गूँजता माँ का नाम है।

धुनुची के धुएँ में जैसे स्वर्ग उतर आया है,
लाल-पाड़ साड़ी में हर माँ ने आज सिंदूर सजाया है।

उलुध्वनि से गूँज रहा है पूरा पूजा-पंडाल,
माँ की आँखों में करुणा, चेहरे पर अद्भुत उजाला है।

नौ दिन हँसी-खुशी में बीते, अब विदाई की घड़ी आई,
सिंदूर खेलते-खेलते हर आँख चुपके से भर आई।

ढाक बजता रहा, “बोलो दुर्गा माई की जय” आसमान तक गई,
पर माँ की प्रतिमा जब चली, तो हर धड़कन जैसे थम गई।

**माँ, इस बार जाते-जाते इतनी कृपा कर जाना—
अगले बरस महालया की पहली भोर में,
फिर अपने मायके लौटकर जल्दी आ जाना।
-सुभम कुमार रवानी।
 
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43 minutes ago

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