उम्र और समय
दोनों साथ - साथ चले उम्र ढलती गई समय बढ़ता गया,
बचपन की यादें धूमिल हो गई और जिम्मेदारियों की रफ़्तार तेज़ हो गई ।
चलना चाहती थी हर कदम समय के साथ पर जिम्मेदारियों ने कदम धीमें कर दिए ,
समय मुस्कुराया मैं देखती रह गई।
अब तो आदत हो गई समय के पीछे भागने की मन में यही ढाने कि आज समय को मात दूंगी मैं भागती गई और समय हंसता गया।
रुकी एक पल देखा खुद को समय मुझ पर नहीं मेरी उम्र पर हँस रहा था, ठहरे कदम दिल काँप उठा अचानक एक क्षण सोचा, वो समय है
उसके पीछे भागना व्यर्थ है उसकी गति निर्धारित है मेरी नहीं,
मैं मुस्कुराई, समय को बाय कहा और चल दी अपनी रफ़्तार से।
वह आज भी देखता है मुझसे दौड़ लगाना चाहता है पर मैं नहीं, दौड़ व्यर्थ है क्योंकि मैं उम्र हूँ और वो समय है।
-ज्योतिमा गौतम
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