आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पुष्प की वेदना

                
                                                         
                            मेरी नाज़ुक पंखुरियों को देख
                                                                 
                            
क्या तुम्हें दया नहीं आई?

अपने प्रणय देवता के लिए
उपहार में देने को मुझे
पाषाण कर तुम अपना
अल्पायु में ही तोड़ मुझे..
क्यों तुम्हें लज़्ज़ा नहीं आई?

धिक्कार! तुम्हारे प्रणय लीला पर
मेरी अस्मत लूटा है..
तुम क्या रक्षा करोगे प्रेमी
प्रेम पुजारिन प्रेमी की
कर न सका जो मेरी रक्षा
असहाय, अबला ,अल्पायु में
बगिया के इस फूलों की
वो क्या खाक करेगा रक्षा
हँसते खिलते यौवन की....

सचमुच वो भी मेरी तरह है
असहाय, अबला, अल्पायु
अलबेली, अल्हड़ मस्त जवानी
तुमसे संभल न सकेगा...
उसकी भी नाज़ुकता....

अगर तू सच्चा प्रेमी है
तो ले आज...ये शपथ
अल्पायु में मत तोड़ना
जीवन की किसी की डोड़..
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर