हृदय में पीर इतनी थी , मैं मिलने आ नहीं पायी ,
हुआ एहसास मुझको जब तो मैं पछता नहीं पायी,
किताबो से निकलकर भी मैं इश्क को जान नहीं पाई,
खड़े थे वो मेरे खातिर, मैं मिलने जा नहीं पाई। ।
-सृष्टि..
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X