इस दुनिया से मैं क्या शिकवा करूँ, सोयब,
जीते जी मरता है आदमी रोज़ चीख़-चीख़कर,
फिर आते हैं कुछ लोग जनाज़े पर उसके चीख़-चीख़कर।
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