तीखी-कड़वी भाषा का, मत करना इस्तेमाल रे,
तेरा मान घटेगा नितप्रति, अपने को पहचान रे।
दुख देगा दोनों पक्षों को, होगा बड़ा अपमान रे,
मीठी वाणी बोलकर, पा ले अपना सम्मान रे।
माँ-बापों ने यही सिखाया, मीठे बोल ही बोल रे,
जैसा होगा व्यवहार तेरा, वैसा ही तू तोल रे।
तेरे वचन-व्यवहारों से, होगा तेरा मान रे,
मात-पिता और कुल की गरिमा, इससे होती पहचान रे।
शब्दों को तू सोच-समझकर, अपने मुख से बोल रे,
कड़वे शब्द हृदय को चीरें, मीठे मन को खोल रे।
वाणी तेरी मित्र बनाए, वाणी करे नुकसान रे,
बोल मधुर तो जग अपनाए, ये "अंजाना" का ज्ञान रे।
क्रोध उठे तो मौन रहना, धीरज को मत हार रे,
एक ही गलत शब्द के कारण, मत बिगाड़ परिवार रे।
क्षमा, प्रेम और सत्य वचन से, बढ़ता तेरा मान रे,
मीठी वाणी सबसे सुंदर, यही मनुज की शान रे।
धन-दौलत से बड़ा जगत में, अच्छा आचरण मान रे,
ऊँचा पद भी फीका पड़ता, यदि कटु हो इंसान रे।
बोल वही जो जोड़ सके दिल, मिटे सभी अभिमान रे,
वाणी में जब प्रेम बसे तो, जीवन बने महान रे।
-सूबा लाल "अंजाना"
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