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उधार का घर

                
                                                         
                            मिला जो उधार में है, चुकाना पड़ेगा,
                                                                 
                            
किराए का यह घर छोड़ जाना पड़ेगा।

मिट्टी का तन है, जिसे जल ने सजाया,
अग्नि के ताप ने आकार है बनाया।
खुले आसमान के तले कुम्हार-सा विधाता,
प्राणों का दीपक इसमें उसी ने जलाया।

प्राण वायु देकर इसे चेतना जगाया,
वाणी देकर जीव का मान दिलाया।
पंचतत्त्वों से रचा यह अद्भुत तन,
क्षणभंगुर जीवन का वरदान बनाया।

पाँचों तत्त्वों का यह जीवन उधार है,
मालिक का हम पर बस इतना अधिकार है।
जब माँगे वह अपनी अमानत किसी दिन,
हँसकर हमें उसको लौटाना पड़ेगा।

मिट्टी को मिट्टी में मिल जाना होगा,
जल को जल में समा जाना होगा।
अग्नि, वायु,अंबर को अपनें स्वरूप में,
जाना पड़ेगा, मिलाना पड़ेगा।

धन-दौलत, पद, वैभव यहीं रह जाएगा,
खाली हाथ आया इन्सां खाली हाथ जाएगा।
साथ सफर में अगर कुछ भी जाएगा तो,
सत्कर्मों का पिटारा ही साथ जाएगा।

मधुर वचन बोलो, प्रेम खूब बांटा करो,
दुखियों के आँसू, चुपचाप पोंछा करो।
न जाने कहां पे कब ये साँस रुक जाये
ईश्वर का प्रसाद समझ हर पल बिताएं।

अभिमान कभी मन में आने न देना,
किसी के हृदय को कभी दुखने न देना।
जो मिला है वही अपना समझना,
किसी का हक़ कभी खाने न देना।

जीवन की यही सच्ची कमाई रहेगी,
करुणा और दया की गवाही रहेगी।
तन तो मिट्टी में एक दिन मिल जाएगा,
पर प्रेम की खुशबू सदा यहीं रह जाएगी।
दोहा
उधार मिला यह देह है, उधार मिली है श्वास।
सत्कर्मों की पूँजी रखो, यही रहेगी पास॥
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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