टोंस नदी की अविरल धारा,
मेरे पास से बहती थी,
बीते दिनों की एक कहानी,
हर लहर जुबानी कहती थी।
प्रयागराज का वह प्यारा गाँव,
नदी किनारे बसता था,
गंगा की पावन धारा संग,
शुद्ध पवन वहाँ हँसता था।
न बिजली थी, न नल था कोई,
न घर-घर जल की धारा थी,
न मोटर थी, न पंप लगा था,
न कोई सिंचाई की धारा थी।
नदी ही जीवन, नदी सहारा,
नदी हमारी माता थी,
घड़ा सिरों पर रखकर नारी,
दूर तलक चल जाती थी।
भोर हुई तो खेतों की ओर,
कंधे पर हल उठाते थे,
बैल जुते रहते थे आगे,
किसान पसीना बहाते थे।
माटी का घर, खपरैल की छत,
आँगन में तुलसी रहती थी,
चूल्हे पर जलती लकड़ी से,
घर की रसोई महकती थी।
दीया-बाती, ढिबरी-लालटेन,
रातों में उजियारा करती,
चाँद सितारे छत पर आकर,
गाँव की नींद संवारा करती।
ज्वार, बाजरा, अलसी, सरसों,
चना, मटर, अरहर की फसलें,
इन्हीं अन्न से घर चलता था,
इन्हीं से भरती थीं थालियाँ।
गेहूँ तब हर घर में कहाँ था,
सीमित ही घर आता था,
जिसके खेत कछार में होते,
वही कुछ गेहूँ पाता था।
बाढ़ उतरती, मिट्टी छोड़ती,
धरती उर्वर हो जाती थी,
कछारों की उस नई मिट्टी में,
फसल सुनहरी छा जाती थी।
कहीं चना और कहीं मटर,
कहीं सरसों मुस्काती थी,
अरहर की पीली-हरी कतारें,
खेतों की शोभा बढ़ाती थीं।
न ट्रैक्टर था, न थ्रेशर था,
न खेतों में मशीनें थीं,
बैल और हल ही साथी थे,
हाथों में किसान की शक्ति थी।
बैलगाड़ी ही साधन होती,
उसी से बोझा आता था,
खेतों से घर, घर से बाजार,
इसी तरह जीवन जाता था।
खाद बनी थी गोबर से तब,
बीज बचाकर रखते थे,
फसल कटे तो खलिहानों में,
दाना-दाना बटोरते थे।
दरांती लेकर नर-नारी सब,
मिलकर फसलें काटते थे,
दोपहरी की धूप में भी वे,
हँसते-गाते मुस्काते थे।
फसल हुई तो पहले घर का,
फिर कुछ अन्न बाजार गया,
जिससे नमक, तेल और कपड़ा,
घर में थोड़ा-बहुत आ गया।
कपड़े कम थे, साधन कम थे,
फिर भी मन में मान बहुत था,
थोड़े में संतोष कर लेना,
गाँव का अपना ज्ञान बहुत था।
न पक्की सड़कें, न बसों की,
हर दिन कोई कतार थी,
कच्ची पगडंडी खेतों के बीच,
गाँव की जीवन-राह थी।
बरसात आई, टोंस उफनी तो,
कछारों में पानी भरता था,
नाव कहीं जीवन की साथी,
कहीं बैल ही रास्ता करता था।
कभी बाढ़ खुशी भी लाती,
कभी बहुत कुछ ले जाती थी,
सिल्ट बिछाकर खेतों में फिर,
धरती को उर्वर कर जाती थी।
मछली, कछुआ, जलचर कितने,
नदी किनारे मिलते थे,
सरकंडे और कांस के झुरमुट,
हवा चले तो हिलते थे।
नदी किनारे बच्चे मिलकर,
खेल-खेल में दिन काटते,
कभी तैरते, कभी किनारे,
रेत के घरौंदे बनाते।
गाँवों में तब मेल-मिलाप था,
दुख में सबके साथ खड़े थे,
किसी घर में संकट आ जाए,
अपने बनकर लोग खड़े थे।
शादी-ब्याह हो या कोई दुख,
सारा गाँव जुट जाता था,
एक चूल्हे की आँच में जैसे,
पूरा गाँव समाता था।
अभाव बहुत थे जीवन में पर,
मन में आशा रहती थी,
मेहनत ही सबसे बड़ी पूँजी,
यही सीख हर साँस कहती थी।
आज समय ने करवट बदली,
बदले गाँव, बदले साधन,
पक्के घर हैं, बिजली पहुँची,
बदली जीवन की परिभाषा।
पर टोंस नदी आज भी बहती,
वैसी ही कुछ बातें कहती—
“मुझमें अपने गाँव की स्मृतियाँ,
अब भी जीवित रहती हैं।”
जब-जब मेरी आँखों के आगे,
बचपन का वह गाँव आता है,
माटी का घर, बैलों की घंटी,
मन को फिर से पास बुलाता है।
टोंस किनारे बीता बचपन,
मेरी सबसे प्यारी थाती,
वही खेत, वह नदी, कछारें,
वही सरल जीवन की बाती।
समय बदल गया, गाँव बदल गए,
बदली जीवन की हर रीत,
पर मिट्टी की वह गंध आज भी,
मेरे मन में है संगीत।
टोंस नदी की अविरल धारा,
आज भी मेरे मन में बहती,
बचपन की हर एक कहानी,
लहरों के संग मुझसे कहती।
मिट्टी, नदी, खेत और किसान—
यही तो मेरी पहली पहचान,
टोंस किनारे बीता बचपन,
यही मेरी जीवन की शान।
-सूबा लाल "अंजाना"
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