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स्मृतियों की मिठास और बिछड़ने की पीड़ा

                
                                                         
                            कभी साथ में थे रहते, अब दूर हो गए हैं।
                                                                 
                            
तेरी याद आती है, मत सोचो भूल हम गए हैं।
बीते हुए जो पल हैं, मस्तिष्क में बसे हैं,
एक-एक को याद करना, मेरे वसूल हो गए हैं।

एक साथ ज़िंदगी के, बीते हुए वो लम्हे,
एक-एक चित्र छप कर, अब किताब बन गए हैं।
जो सोचता हूँ दिनभर, वही रात दिख रहे हैं।
हर एक पृष्ठ अब वो, मेरे ख़्वाब बन गए हैं

गिन-गिन के सारे पल वे, अब जोड़ हम रहे हैं,
बिखरे हुए सपनों को फिर मोड़ हम रहे हैं।
दिल की बुझी शमा को यादों से जला रहे है,
तन्हाइयों के संग ही अब दौड़ हम रहे हैं।

मिलने की चाह दिल में लेकर के घूमते है,
एक बार कह के देखो,कैसे हम झूमते है।
सूखी हुई ये बगिया एक फिर से खिलेगी।
तुम पुष्प बनके महको, खुशबू भी आ मिलेगी।

उन्नति की सीढ़ियां ही,चढ़ते रहो सदा ही।
किस्मत के तुम धनी हो,बस ये दुआ हमारी,
न शिकवा, न गिला है,बस इस बात की खुशी है,
कभी दिल से याद कर लो,ये है आरज़ू हमारी।

रिश्ते अगर हों सच्चे, दूरी नहीं मिटाती,
यादों की रोशनी ही जीवन को जगमगाती।
कभी साथ में थे रहते, अब दूर हो गए हैं।
तेरी याद आती है, मत सोचो भूल हम गए हैं।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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