मत शांति को खो देना यूँ ही,
कुछ सब्र करो, कुछ सब्र करो,
खो गई शांति मन से गर तो,
फिर चैन से न रहने देगी।
मन यदि घमंड में हो चूर अगर,
पद, मान और धन याद रहे,
चारित्र्य और सम्मान बड़ा,
इनसे बढ़कर क्या याद रहे।
कितना भी बड़ा पदधारी हो,
चलता है सभी भरोसे पर।
इज़्ज़त से समझौता कर के,
कभी क़त्ल भरोसे का ना करना।
स्थायी कुछ भी नहीं यहां,
जो आज है, कल वो न भी रहे।
जो मिला है उसका भोग करो,
पर लोभ न उसका कभी करना।
धन-दौलत, पद, यश क्षणभंगुर,
इन पर न कभी अभिमान करो,
सत्य, संयम और सद्कर्मों से,
जीवन को अपने महान करो।
— सूबा लाल “अंजाना”
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