सावन की बूँदें जब गिरातीं,
धरती का मन मुस्काता है।
सूखी डाली, मुरझाए उपवन,
हरियाली से भर जाता है।
काले बादल नभ में छाए,
दामिन शोर मचाती है।
रिमझिम-रिमझिम जल की बूंदें,
मन चंचल कर जाती है।
माटी की सोंधी-सी खुशबू,
मन को महकाती है।
मोर पंख फैलाकर नाचे,
कोयल गीत सुनाती है।
नदियाँ फिर इठलाकर बहतीं,
खेतों में प्राण आ जाते है।
किसानों के सूने चेहरे पर,
आशा के फूल खिल जाते हैं।
बच्चों की कागज़ की नावें,
पानी में तैरती जाती हैं।
हँसी-ठिठोली, खेल-कूद से,
गलियाँ भी इतराती हैं।
सावन केवल जल ही नहीं,
जीवन का उत्सव लाता है।
सूखे मन में प्रेम, उमंग और
नव विश्वास जगाता है।
अंजाना मिलकर वृक्ष लगाएँ,
धरती का श्रृंगार करें।
सावन की हर बूँद का हम,
जीवन भर सत्कार करें।
-सूबा लाल "अंजाना"
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