वृक्षों के पत्तों से छनकर,
बूँद-बूँद सिर पर टपके,
छन-छन करती वर्षा रानी,
थिरक-थिरक करके बरसे।
हरियाली मन को अति भाए,
रिमझिम बरखा गीत सुनाए,
मगन मोर घनघोर घटा में,
नृत्य करे हर्षाए।
तीव्र धार जब क्षीण धरा पर,
जल की राह बनाए,
नाली से बह ताल-तलैया,
नदियाँ भरती जाएँ।
नदी मिले जाकर सागर में,
सागर रूप बढ़ाए,
रूप भयंकर धारण करके,
यही विनाश मचाए।
प्रकृति की महिमा कौन समझे,
कब क्या रूप दिखाए,
कभी खुशी के पुष्प बिछाए,
कभी रौद्र हो जाए।
कभी हमें फल, फूल, फसल दे,
खनिजों से सुख पाएँ,
कभी तूफानी आँधी, बाढ़ें,
सब कुछ साथ बहाएँ।
वृक्ष लगाएँ, वृक्ष बचाएँ,
धरती को हरियाली दें,
निर्मल जल और शुद्ध हवा से,
जीवन को खुशहाली दें।
वन होंगे तो वर्षा होगी,
वर्षा से अन्न उगाएँ,
नदियाँ, झरने, ताल-तलैया,
जीवन-पथ को सजाएँ।
प्रकृति माँ का मान रखेंगे,
नहीं उसे हम दूषित करेंगे,
जल, जंगल और जीव-जगत का,
मिलकर संरक्षण भी करेंगे।
शुद्ध हवा हो, निर्मल पानी,
स्वच्छ धरा मुस्काए,
मानव भिन्नजब प्रकृति सँवारे,
धरती स्वर्ग बन जाए।
-- सूबा लाल "अंजाना"
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