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नाम के आगे क्या है?

                
                                                         
                            कोई पूछता, नाम क्या है
                                                                 
                            
तो बड़ा अच्छा लगता है,
पर जैसे ही पूछे आगे—क्या है?
दिल धक से करता है।

आख़िर इसमें मेरा दोष ही क्या?
क्यों डर की छाया पीछे है?
क्या कपड़े के रंग से है,
या बोली और भाषा से है?

या शारीरिक संरचना से,
आख़िर भेद कहाँ है हममें?
सब कुछ एक समान है फिर भी,
भेदभाव क्यों है मन में?

एक सोच ही ऐसी बन बैठी,
कोई इसको बदल सकता है क्या?
खुद ही वही बनकर सोचो तो,
ऐसा कभी कर पाओगे क्या?

जो सोच दूसरों पर रखते,
खुद पर वैसी धर पाओगे?
क्या मैला सिर पर खुद ही उठा,
जीवन अपना जी पाओगे?

जूते खुद ही से निर्मित कर के,
उस अकड़ में क्या रह पाओगे?
मजदूर की श्रेणी में रहकर,
क्या ऐसी बातें सह पाओगे?

इंसान हो तुम, इंसान हैं हम,
एक ही वृक्ष के फल हैं हम,
खुद से खुद ही दीवार बनाकर,
अलग-अलग क्यों रहते हम?

इंसानियत रखकर देखो तो,
अपने से अलग न पाओगे,
भाईचारे से जीवन अपना,
मिल-जुलकर ही निभाओगे।

मानव जीवन दुर्लभ इतना,
मत भेदभाव में नष्ट करो,
जो मिला समय, उपयोग करो,
ईश्वर से कभी मत गिला करो।

जैसा जीवन में बीज बोओगे,
फल भी वैसा ही पाओगे,
धर्म, कर्म, सेवा, सत्चरित्र से,
जीवन सफल बनाओगे।
— सूबा लाल “अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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