जीवन भी वह कितना मुश्किल,
जब अपना कोई खेत नहीं था,
चारों ओर खेत थे उनके,
बीच हमारा घर होता था।
दूसरों के खेतों पर निर्भर,
मेहनत ही पहचान हमारी,
जिस मिट्टी को सींचा हमने,
उस पर अपनी न दावेदारी।
बरसातों में खेत लबालब,
चारों ओर फसलें रहती थीं,
हरियाली की चादर बिछती,
पर आँखें अपनी कुछ कहती थीं।
शौचालय तब गाँव में कहाँ था,
सुविधा कोई पास नहीं थी,
खेतों के सिवा गरीबों को,
दूसरी कोई आस नहीं थी।
फसलें खड़ी चारों ओर होतीं,
लाज बचाना कठिन बहुत था,
सुबह-सवेरे अँधियारे में जाना,
मानो जीवन का दुखद सत्य था।
दबंगों का अपना डर था,
अपना ही कानून था चलता ,
गरीब अगर आवाज उठाता,
उस पर ही इल्जाम था मढ़ता।
डरना, धमकाना, आँख दिखाना,
उनका जैसे खेल बना था,
कमजोरों को दबाकर रखना,
मानो उनका हक बना था।
जात-पाँत का खेल उन दिनों,
गाँव-गाँव में चलता था,
ऊँच-नीच की दीवारों में,
मानव मन भी बँटता था।
छोटी-छोटी बातों पर अक्सर,
तू-तू, मैं-मैं होती थी,
मन में पलती जात की दूरी,
बात-बात पर होती थी।
गरीब की हालत ऐसी थी,
कहना भी मुश्किल होता था,
पेट भले ही खाली रहता,
फिर भी श्रम करना पड़ता था।
न अपना खेत, न अपना साधन,
न सिर पर पक्की छत थी,
फिर भी आँखों में सपना था,
मेहनत ही अपनी ताकत थी।
माटी का घर, खपरैल की छत,
आँगन में तुलसी रहती थी,
चूल्हे पर जलती लकड़ी से,
घर की रसोई महकती थी।
दीया-बाती, ढिबरी-लालटेन,
रातों में उजियारा करती,
चाँद सितारे छत पर आकर,
गाँव की नींद संवारा करते।
— सूबा लाल "अंजाना"
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