उम्र, धन, ऊँचे पद ये सब, किसी काम न आएगा,
जो लोगों के साथ खड़ा दुख, वही बड़ा कहलाएगा।
जिसकी आँखों में करुणा हो और दिल में मानवता हो।
जो निर्बल का हाथ पकड़ ले, सच्चा मानव कहलाएगा।
जिसको पद धन शक्ति सब हो,फिर भी व चुप चाप रहे,
नारी का सम्मान लुटे, और उसका साहस सुप्त रहे।
बच्चों की चीखें सुनता हो, वृद्धों की पीड़ा देख रहा।
अन्याय की जलती ज्वाला में,मानवता जलते देख रहा।
सब शक्ति होने पर भी यदि, अन्याय से मुँह वह मोड़ लिया। अपने स्वार्थ की चादर ओढ़के, सत्य की राह ही छोड़ दिया।
तो वह मानव मात्र नहीं, अन्याय का भागीदार है।
उसका मौन ही अपराधी, उसका डर ही गुनहगार है।
कहता है इतिहास यही,अत्याचारी से कम भी नहीं,
वह भी उतना ही दोषी है,जितना अत्याचारी नहीं।
उठो, अगर इंसान हो तुम, मानवता का मान बचाओ।
अबला, बालक, वृद्ध सभी का, हर संकट में साथ निभाओ।
याद रखो—
धन, बल,पद से नहीं मान है, है चरित्र से पहचान बड़ी।
अन्याय के विरुद्ध होता जो, जुड़ता हर उत्तम श्रेणी।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X