ठोकरें जब पाँव चूमें, रास्ता जब मुड़ चले,
हौसला वो ही बड़ा, जो आँधियों में भी पले।
गिर गया गर राह में तो हार का मातम न कर,
धूल माथे से लगा और फिर नए पथ पर चल पड़े।
रात कितनी भी घनी हो, भोर को आना ही है,
सूर्य को हर रोज़ तम का सीना सुलगाना ही है।
जो थके पाँवों से बैठा, मंज़िलें उसकी नहीं,
ज़िंदगी उसकी हुई जो गिर के मुस्काता चले।
छू न पाए आसमाँ तो क्या हुआ यह पर कटे,
उड़ वही सकता गगन में जिसके डर सारे छंटे।
सीढ़ियाँ हैं इम्तिहाँ की, हर कदम पर फिसलनें,
जीत का परचम वही, जो गिर के फिर उठकर लड़े।
हार कोई अंत थोड़ी, सीख का पैग़ाम है,
जो डटा संघर्ष पथ पर, उसका ही तो नाम है।
लौट आ तू फिर समर में, ताक़तों को बाँध ले,
मंज़िलें खुद झुक पड़ेंगी, लक्ष्य अपना साध ले।
-सूबा लाल " अंजाना "
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