जिसके तन-मन कोई भाव न हो,जन-जन की सेवा क्या जाने।
पाषाण-हृदय का स्वामी हो जो,वह सरल,सरस क्या पहचाने।
आँखों में करुणा-नीर न हो,परहित हिय जिसके पीर न हो।
जहाँ स्पर्श में संवेदना न हो,मानवता का मर्म वह क्या जाने।
मृगतृष्णा बिन प्यास - भाव,मरुभूमि की तीव्र तपन की ताप;
नंगे पाँव तपती बालू की राह—या मृग जाने, या राही जाने।
नींद का सुख मजदूर ही जाने,भूख का अर्थ भूखा जाने।
दर्द वही सचमुच समझ सके,जिस पर बीती वो स्वयं जाने।
दृष्टि तो सबकी एक-सी होती,दृष्टिकोण यदि एक हो तो मानें।
मानव-मन में गर प्रेम जगे, सच्चा इंसान तभी मानें।
— सूबा लाल "अंजाना"
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