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मैं सफलता हूँ

                
                                                         
                            वाह! मैं भी कितनी अनमोल हूँ,
                                                                 
                            
न बाज़ारों में बिकती हूँ, न सौदों में मिलती हूँ।
न सिफ़ारिश से आती हूँ, न किस्मत से झुकती हूँ,
मैं तो केवल मेहनत करने वालों के चरण चूमती हूँ।

पूछा किसी ने—"आख़िर तेरा सबसे अपना कौन?
"मैं हँसकर बोली—"वह मज़दूर, जिसके माथे पर पसीने का ताज है,
जिसके हाथों में छाले हैं, मगर हौसलों में परवाज़ है।"

तुम भी चलना सीख लो, गिरकर फिर सँभलना सीख लो,
रूखी-सूखी मिले तो उसको हँसकर खाना सीख लो।
प्यास लगे तो पानी पी लो, दुख भी मिले तो सहना सीख लो,
गाली मिले तो खाना और डाँट मिले तो पचाना सीख लो।

काम मिले तो जी-जान से उसे निभाना,
न मिले तो नया रास्ता खुद बनाना।
भाग्य की रेखाएँ हथेली नहीं बदलतीं,
मेहनत की लकीरें मुकद्दर बदल जाया करती हैं।

संतोष को अपना धन बनाओ,
ईमानदारी को अपनी पहचान बनाओ।
प्रेम को पूजा, इंसानियत को धर्म बना लो,
माँ-धरती और गगन को अपना घर बना लो।

मीठी वाणी, विनम्र स्वभाव और बड़ों का सम्मान,
यही है जीवन की सबसे सच्ची पहचान।
जिसने इन गुणों को अपने भीतर बसा लिया,
उसने बिना ताज पहने ही संसार जीत लिया।

मैं सफलता हूँ... अनमोल हूँ...
हर किसी के नसीब में नहीं होती।
पर जो पसीने की हर बूँद को पूजा बना ले,
मैं उसके जीवन की स्थायी साथी बन जाती हूँ।

"अंजाना" एक बार खुद पर विश्वास करके देखो,
मेहनत का दीपक पूरी शिद्दत से जलाकर देखो।
मैं कहीं दूर नहीं, तुम्हारे ही पसीने में रहती हूँ,
जो कर्म को भगवान मान ले, मैं उसी के घर बसती हूँ।
-सूबा लाल "अंजाना"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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