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कौन हमें समझावे

                
                                                         
                            बिना पिया दुख कौन सुने,
                                                                 
                            
कौन हमें समझावे।
दुख की बदरी घिरि-घिरि आवे,
बिजुरी भी डरावे।
कौन हमें समझावे॥

पिया बसे परदेस में जाके,
कोई संदेश न आवे।
याद करूँ मैं दिल से पुकारूँ,
शायद मुझे सुन न पावे।
कौन हमें समझावे॥

बंद हैं आँखें, नींद न आवे,
रह-रह के तेरी याद सतावे।
कितनी दूर है तेरो वासा,
फोन न आवे-जावे।
कौन हमें समझावे॥

बीत गए कई बरस बुलाते,
प्रेम-क्रोध में रोते चिल्लाते।
कोई तो मुझको राह बता दे,
कुछ भी समझ न आवे।
कौन हमें समझावे॥
-सूबा लाल “अंजाना”
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3 महीने पहले

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