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कपड़ों से ही पहचान

                
                                                         
                            कपड़ों से ही पहचान बनी और कपड़ों ने ही सम्मान दिया,
                                                                 
                            
कपड़ों ने आपस के प्यार के बीच नया व्यवधान किया।

वस्त्र बदलते ही चेहरे का पूरा अर्थ बदल जाता है,
बाहर का दिखावा अक्सर अंदर का अंदर रह जाता है।

जिस तन पर इतना गर्व किया, वह मिट्टी में मिल जाता है
रंग, धर्म, पद, जाति, वेश सब समय के संग ढल जाता है।

इसलिए रे मानव खुद को न सजाओ,मन में दया धारण धरो,
तन के कपड़ों से पहले तुम, मानवता का रूप धरो।

कफ़न ओढ़कर जाना ही है तो, क्यों इतना अभिमान करें?
एक ही धरती, एक गगन है—आओ सबका सम्मान करें।
-सूबा लाल"अंजाना"
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2 महीने पहले

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