झोपड़ी से एक दिन मिट जाएगा ये अंधेरा,
मेहनत की मशाल लेकर तू कर ले नया सवेरा।
किस्मत को दोष न देना, खुद अपनी तकदीर लिख,
मिट्टी के इस छोटे घर से, सपनों की तस्वीर लिख।
क्यों डरता है रे तू बच्चा, क्या खोने का डर है?
तेरे आगे खुला गगन है, दुनिया बहुत बड़ी है।
आज भले सिर पर छप्पर है, पैरों में टूटी चप्पल,
कल मेहनत के बल पर होगा, अपना सुंदर-सा महल।
तू रुकना मत, तू झुकना मत,
तू थकना मत, तू डरना मत।
झोपड़ी तेरी पहचान नहीं,
तू अपनी किस्मत बदल सकता है।
कलम उठा, संकल्प जगा,
तू दुनिया को हिला सकता है।
तेरे हाथों में छाले हैं तो, ये तेरी हार नहीं,
तेरी आँखों के सपने ही, तेरी सबसे बड़ी निशानी।
जिसके पास नहीं धन-दौलत, उसके पास इरादा हो,
जिसके भीतर आग लगी हो, उसका हर दिन ज्यादा हो।
एक-एक पैसा जोड़ मगर, शिक्षा को मत छोड़ कभी,
भूखा रहना पड़ जाए तो, सपनों से मत तोड़ कभी।
फटी किताब हो हाथों में, फिर भी पढ़ता जाना तू,
रात अँधेरी चाहे जितनी, दीप जलाता जाना तू।
कलम तेरा हथियार बने,
शिक्षा तेरी ढाल बने।
ज्ञान की शक्ति साथ रहे तो,
दुनिया तेरे नाम बने।
मेहनत को तू अपना साथी,
लक्ष्य को अपना प्यार बना,
आज झोपड़ी चाहे तेरी,
कल उसको गुलज़ार बना।
काँटों के संग खिलती कलियाँ, फिर खुशबू फैलाती हैं,
पत्थर खाकर नदियाँ भी तो, सागर तक पहुँच जाती हैं।
कीचड़ में रहकर कमल कहता—मैं कीचड़ से हारूँगा नहीं,
तू भी अपनी गरीबी से कह—मैं इससे रुकूँगा नहीं।
सूरज बनकर निकल क्षितिज पर, रात को दूर भगाना है,
अपने श्रम की एक-एक बूंद से, जीवन-दीप जलाना है।
लोग हँसेंगे, लोग कहेंगे—इसमें क्या कर पाएगा?
तू चुप रहकर कर्म करेगा, वक्त स्वयं बतलाएगा।
लोगों की बातों पर मत चल,
अपने मन की सुनता चल।
गिर जाए तो फिर उठ जाना,
हर मुश्किल को चुनता चल।
हार अगर सौ बार मिले तो,
सौ बार फिर लड़ना है,
जब तक मंज़िल हाथ न आए,
तब तक आगे बढ़ना है।
मुश्किल को देखकर डरना क्या, तू मुश्किल से टकरा जा,
जिस दीवार ने राह रोकी, उसको तोड़कर आगे जा।
बिजली बनकर दौड़ नसों में, पर्वत जैसा सीना कर,
आज गरीबी तेरी चुनौती, कल उसको तू जीना कर।
ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा, मेहनत सबकी शान है,
जिसने श्रम को पूजा समझा, उसकी अलग पहचान है।
मजदूर पिता की संतानों, तुम भी इतिहास रचोगे,
आज भले हो मिट्टी के घर में, कल ऊँचे बंगले भी होंगे।
झोपड़ी से बंगले तक का
रास्ता कठिन जरूर है।
पर मेहनत करने वालों के,
लिए कहाँ कुछ दूर है।
पसीने की हर बूंद कहे—
“तू जीत सकता है!”
तेरा दृढ़ संकल्प कहे—
“तू बदल सकता है!”
सुबह सवेरे उठकर बच्चा, अपना लक्ष्य बनाया कर,
थोड़ा-थोड़ा रोज पढ़ा कर, खुद को रोज बढ़ाया कर।
मोबाइल, खेल और आलस से, कुछ दूरी तू बनाकर रख,
अपने सपनों की खातिर तू, अपनी नींद घटाकर रख।
माँ की आँखों का सपना बन, पिता की मेहनत का मान बन,
अपने छोटे से परिवार का, तू आने वाला अभिमान बन।
जिस घर में आज चूल्हा मुश्किल, वहाँ उजियारा करना है,
माँ के सिर पर पक्का छप्पर, पिता को सुख देना है।
आज किताबें माँग रही हैं,
कल दुनिया तेरा नाम पढ़ेगी।
आज तू संघर्ष करेगा तो,
कल तेरी कहानी गढ़ेगी।
आज पसीना बहा ले बच्चा,
कल खुशियों की बारी है,
झोपड़ी से बंगले तक की,
ये तेरी जिम्मेदारी है।
पीछे मुड़कर देखना मत तू, मंज़िल आगे खड़ी हुई,
तेरे साहस के आगे देखो, हर बाधा है पड़ी हुई।
एक कदम फिर एक कदम बस, चलते जाना है तुझको,
अपने श्रम से अपने जीवन का, सूरज बनाना है तुझको।
तू गरीब है—ये मत सोच कि, सपने भी गरीब होंगे,
तेरी मेहनत से तेरे कल के, सारे रंग करीब होंगे।
जिस दिन तेरी आँखों में फिर, लक्ष्य का दीप जलेगा,
उस दिन तेरी झोपड़ी से ही, सफलता का सूरज निकलेगा।
चल बच्चा अब देर न कर,
अपनी राह बना ले तू।
मिट्टी से उठ, आसमान छू,
अपना भाग्य बना ले तू।
कल तक जिस घर में छप्पर था,
उसमें खुशियाँ लानी हैं,
झोपड़ी से बंगले तक की,
नई कहानी लिख जानी है।
न धन चाहिए जन्म से तुझको, न ऊँची कोई जात चाहिए,
बस शिक्षा, श्रम और साहस की, जीवन भर सौगात चाहिए।
तेरी कलम में ताकत होगी, तेरी सोच उड़ान बनेगी,
तेरे कदमों की आहट से ही, तेरी नई पहचान बनेगी।
तू भारत का भविष्य है,
तू अपनी पहचान बने।
तू अपने घर का दीप बने,
तू जग की भी शान बने।
मेहनत तेरी पूजा हो और,
शिक्षा तेरा भगवान बने,
आज झोपड़ी में जन्मा बच्चा,
कल देश का महान बने।
न रुकना है, न झुकना है, न थकना है, न हारना है,
अँधियारे से लड़ते-लड़ते, अपना सूरज तारना है।
जिस दिन मेहनत रंग लाएगी, खुशियों से घर भर जाएगा,
आज का ये छोटा-सा सपना, कल बंगला बन जाएगा।
उठ!
कलम उठा!
लक्ष्य बना!
मेहनत कर!
संघर्ष कर!
ज्ञान जगा!
अपने भीतर आग जला!
और दुनिया से कह दे—
“मैं झोपड़ी में जन्मा हूँ,
पर झोपड़ी में मरूँगा नहीं।
गरीबी मेरी मजबूरी हो सकती है,
मेरी मंज़िल नहीं।
मैं मेहनत करूँगा,
मैं पढ़ूँगा,
मैं आगे बढ़ूँगा—
और एक दिन
अपनी झोपड़ी से निकलकर
सफलता का अपना बंगला बनाऊँगा!”
-सूबा लाल "अंजाना"
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