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जीवन की सीढ़ी

                
                                                         
                            जिस सीढ़ी से चढ़कर हम धीरे-धीरे ऊपर जाते हैं,
                                                                 
                            
उसी सीढ़ी से एक दिन उतर के हम नीचे भी आते हैं।

जीवन का यह ग्राफ हमारा कुछ सीमा तक बढ़ता है,
उम्र का हर बीतता हुआ पल जीवन को कम करता है।

मानवता के शिखर पर जो अपना स्थान बनाता है,
प्रेम, मान-सम्मान और खुशियों का उपहार वह पाता है।

हँसकर सबसे बात करे जो, प्रेम-सुधा बरसाता है,
' अंजाना ' की प्रेम लहर बन, खुशियाँ साथ में लाता है।

ऊँचा उठना लक्ष्य हो अपना, मन में रहे विनम्रता,
सबके सुख-दुख में सहभागी बनना ही है श्रेष्ठता।

धन-दौलत का मान घटेगा, पद का भी अवसान होगा,
प्रेम और सद्भाव से ही जीवन का सम्मान होगा।

सीख यही है जीवन की, मत करना अभिमान कभी,
मानवता की राह चलो, सच्ची होगी पहचान तभी।
-सूबा लाल ' अंजाना '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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