बड़ी चाह थी इस जीवन को, कोई बड़ा आयाम दूँ,
जीवन के आरंभ काल में ही, जग को कोई पैगाम दूँ।
मन में अनगिनत पहेलियाँ थीं, अंतरमन भी मौन खड़ा था,
पर समय की तीव्र धार के आगे, जो कर पाया वही बड़ा था।
कोई पाबंदी ताउम्र नहीं, अब भी बहुत कुछ कर सकते हो,
समय को दोषी मत ठहराओ, खुद में काबिलियत भर सकते हो।
हर क्षण कुछ-न-कुछ सिखलाता है, जितना सीखो उतना कम है,
यदि मन में सच्ची चाहत हो, तो कुछ करने को जीवन कम है।
राह कठिन हो, पथरीली हो, "अंजाना" कदम न रुकने दो,
अपने श्रम की तपती ज्वाला में, स्वप्नों को मन में पलने दो।
जीवन उसका सार्थक होता, जो जग को नई दिशा देता है,
मरकर भी वही अमर रहता, इतिहास जो रच कुछ कर देता है।
-सूबा लाल "अंजाना"
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