उम्र ढल रही पुरानी चादर-सी,
उसको सीना सीख लो।
बचपन की खुशियाँ बिखरी हैं,
उनको चुनना सीख लो।
यारों की उन प्यारी यादों को,
फिर से बटोरना सीख लो।
सुख-दुख में जो साथ रहे हैं,
उनसे मिलना सीख लो।
कभी फोन पर बातें करके,
मन को हल्का कर लेना।
यादों के पन्ने खोल-खोलकर,
खुशियों के पल जी लेना।
जीवन-संगिनी की बातों को,
शरबत समझकर पी लेना।
बेटे-बहू के साथ प्रेम से,
हँसकर मिलकर रह लेना।
हर बात का उत्तर देना,
ज़रूरी नहीं समझ लेना।
घर की छोटी-मोटी बातों को,
हँसकर टालना सीख लेना।
कान में कड़वे बोल पड़ें तो,
धीरज रखना सीख लो।
तीखी बातों की आँच में भी,
खुद को तपना सीख लो।
अपनी जिद को थोड़ा छोड़ो,
दूसरों को समझना सीखो।
जहाँ झुकने से प्रेम बचे,
वहाँ झुकना भी सीखो।
बच्चों को उपदेश न देकर,
उनका मन पढ़ना सीखो।
उनकी दुनिया अलग है तुमसे,
यह सच स्वीकारना सीखो।
बीते कल का शोक छोड़कर,
आज में जीना सीख लो।
जो कुछ मिला है जीवन में,
उसमें खुश रहना सीख लो।
सुबह-सुबह जब सूरज निकले,
नई उमंगें भर लेना।
थोड़ा चलना, थोड़ा हँसना,
खुद के लिए भी जी लेना।
मंदिर जाकर शीश झुकाना,
मन में प्रेम जगाना।
सेवा, सुमिरन और सद्भाव से,
जीवन सफल बनाना।
उम्र भले ही ढलती जाए,
मन को मत ढलने देना।
जीवन की इस संध्या में भी,
आशा का दीप जलाए रखना।
जीवन केवल काटो मत,
हर पल को त्योहार बना लो।
जब तक साँसें साथ निभाएँ,
तब तक जीना सीख लो।
-सूबा लाल "अंजाना"
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