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एक लंबी यात्रा

                
                                                         
                            काली रात का फैला आँचल,
                                                                 
                            
टेढ़ी मेढ़ी सांप सी डगर
दूर तलक न बस्ती कोई,
और न दूजा कोई शहर।

मोड़ों पर बलखाती जाती,
टेढ़ी-मेढ़ी सड़क पे कारें,
तेज़ गति मे हवा से बाते
भरती जाती हुंकारें।

रंग-बिरंगी गाड़ियाँ सारी,
होड़ में आगे बढ़ने को,
हवा चीरती निकल रहीं थीं,
एक-दूजे से लड़ने को।

‘सूँ-सूँ’ करती सरसराहट से,
गूँज रहा सन्नाटा सारा,
कानों को बेधती जा रही,
गति की यह उन्मत्त धारा।

पीली बत्तियों की किरणों से,
सड़कें सोने-सी चमकें,
रात घनेरी पर ज़मीं पर,
जैसे सौ-सौ दीये दमकें।

पेड़-पौधे और ऊँचे टीले,
उल्टे पाँव भागे जाते,
नदी, नाले और विशाल तरु,
पलक झपकते ओझल हो जाते।

मंज़िल की इस अंधी धुन में,
प्रकृति पीछे छूट रही,
गति के उस उन्माद तले,
हर सुंदर छवि टूट रही।

लक्ष्य अभी कुछ दूर खड़ा था,
राहें थीं वीरान बड़ी,
किंतु दौड़ में शामिल हर आँख,
बस आगे ही टिकी रही।

गति, चमक और अंधकार का,
यह कैसा अद्भुत ताना-बाना,
रात के सीने पर पहियों का,
एक नया इतिहास बनाना।
 
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1 hour ago

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